journalmucojor@gmail.com +91 91738 61986

ब्रजभाषा के सशक्त हस्ताक्षर : दयाराम

Keywords : ब्रजभाषा, शृंगार, भक्ति, नीति, प्रेम लौकिक, अलौकिक , मध्ययुग,

Abstract : हिंदी साहित्य के इतिहास में पुर्व मध्यकाल को स्वर्ण काल के रूप में पहचाना जाता है। पुर्व मध्यकाल को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्तिकाल नाम दिया है। भक्तिकाल के कवियों ने अपने साहित्य में सुन्दर ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। जिनमें महाकवि संत तुलसीदास, महाकवि सूरदास कबीर, मीराबाई, रहीम, रसखान आदि प्रमुख कवि रहे है। वैसे ही गुजरात के प्रसिद्ध कवि दयाराम ने भी अपने काव्य ग्रंथों की भाषा ब्रज बनाई। ब्रजभाषा को सुशोभित करने में तुलसीदास तथा सूरदास के साथ साथ दयाराम का भी अपूर्व योगदान दिया है। दयाराम की मातृभाषा गुजराती होने के बावजूद भी सुंदर व सशक्त ब्रजभाषा का प्रयोग किया। दयाराम को तीर्थाटन के समय अनेक संत कवियों से समागम हुआ। अत: उनकी ब्रज देखकर दयाराम को भी ब्रज में लिखने की प्रेरणा मिली।अष्टछाप के कवियों के ब्रज साहित्य ने दयाराम को विशेष आकर्षित किया। गुण और मात्रा की दृष्टि से दयाराम की ब्रज में लिखित रसिकवल्लभ,नीतिभक्ति के पद एवं सतसई महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। दयाराम रचित सतसई ब्रजभाषा की उत्तम व श्रेष्ठ रचना मानी जाती है। जिसमें दयाराम ने बिहारी सतसई की तरह श्रृंगार, भक्ति, नीति, दर्शन आदि अनेक विषयों का दोहा छंद में निरूपण किया है। श्रृंगार रस का सुन्दर वर्णन उनके काव्य की शोभा बढ़ाता है। प्रेम के लौकिक और आलौकिक दोनों रूपों का वर्णन हमे उनके काव्य में दिखाई देता है।

Download