Keywords : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सोशल मीडिया, ऑनलाइन विनियमन, मध्यस्थ दायित्व, डिजिटल अधिकार, भारतीय संविधान
Abstract : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक समाजों की आधारशिला है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के तीव्र विस्तार के साथ अभिव्यक्ति के स्वरूप, दायरे और प्रभाव में मूलभूत परिवर्तन आया है। जहाँ सोशल मीडिया ने संचार को लोकतांत्रिक बनाया है और नागरिक सहभागिता को बढ़ावा दिया है, वहीं इसने गलत सूचना, घृणा भाषण, साइबर उत्पीड़न तथा सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे जैसी समस्याओं को भी जन्म दिया है। इन चुनौतियों के प्रत्युत्तर में भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों ने ऑनलाइन अभिव्यक्ति को नियंत्रित करने हेतु विनियामक ढाँचे विकसित किए हैं। यह शोध लेख भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सोशल मीडिया विनियमन के बीच विकसित होते संबंध का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है। इसमें संवैधानिक सीमाओं, वैधानिक प्रावधानों तथा प्रमुख न्यायिक निर्णयों का अध्ययन किया गया है तथा मध्यस्थ दायित्व की भूमिका का मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था एवं डिजिटल नैतिकता जैसे सामाजिक हितों के बीच गंभीर तनाव विद्यमान है। शोध का निष्कर्ष है कि यद्यपि विनियमन आवश्यक है, किंतु अत्यधिक या अस्पष्ट प्रतिबंध लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर सकते हैं; अतः एक संतुलित, पारदर्शी और अधिकार-आधारित विनियामक दृष्टिकोण अनिवार्य है।
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