Keywords : :प्रभा खेतान, नारी मनोविज्ञान, स्त्री-विमर्श, महिला चेतना, हिंदी उपन्यास, नारी अस्मिता, महिला सशक्तिकरण, समकालीन हिंदी साहित्य, नारी संवेदना, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
Abstract : समकालीन साहित्य में नारी स्त्री विमर्श एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है और नारी की नई भूमिकाओं को पारिभाषित करने का एक शक्त माध्यम रहा है। यह नई सदी में नारी की आवाज को संसद से सड़क तक और परिवार के चहारदीवारी से विश्व भर में पहुँचाने का सशक्त एवं शक्तिशाली साधन साबित हुआ है। प्रत्येक वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन भी इसका प्रतीक है। नारी विमर्श के माध्यम से महिला साहित्यकारों ने अपनी लेखनी के बल पर इस अभियान एवं आंदोलन का उड़ान भरने के लिए दमदार पंख दिया है। जो आज के नारी की सामाजिक स्थिति एवं आर्थिक स्थिति में बदलाव में महती योगदान प्राप्त हुआ है। नारी जीवन के मूल्यवान क्षणों में परिवार, समाज एवं देश हित में अपने को समर्पित रखती है। स्त्री विमर्श में पुरुष लेखक कितनी भी संवेदनशीलता दिखाये, वह स्त्री का मार्मिक वृतांत नहीं लिख सकता। नारी के पक्ष में लेखन आदर्शवाद है जबकि अपने पक्ष में नारी का लेखन उसकी यथार्थ वाद है। आदर्शक तुलना में यथार्थ की जड़ें हमेंशा काफी मजबुत होती है। इसलिए नारी लेखन सदैव प्रासंगिक बनी रहेगी। मनुष्य एक सामाजिक एवं संवेदनशील प्राणी है। वे अपनी भावनाओं, विचारों एवं लालसाओं को दूसरों तक पहुँचाने का सार्थक प्रयास करते हैं। साहित्यकार भी एक संवेदनशील मनुष्य होता है जो मानवीय भावनाओं, चेतनाओं, विकारों, विद्वपताओं और समस्याओं का उदघाटन अपने साहित्यों के माध्यम से करते हैं। उनकी साहित्यिक सृजनशीलता, कलात्मकता एवं संवेदनशीलता ही उनकी साहित्यिक विधा की कसौटी होती है। हमारा इंद्रिय बोध, भावबोध, और विचार बोध अभिव्यक्ति के जिन विविध रूपों को जन्म देता है, उनमें एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक विधा है- उपन्यास। अन्य साहित्यिक विधाओं की भाँति उपन्यास भी हमारी उस अनुभूति-प्रवणता को, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रभावों को ग्रहण करने की क्षमता रखती है और जिसे संवेदना नाम से अभिहित किया जाता है। समकालीन महिला उपन्यास कारों ने अपने उपन्यासों के नारी के विभिन्न भावनाओं, चेतनाओं, विचारों, कठिनाइयों को उजागर किया है जो वास्तविक रूप में नारी मनोविज्ञान के विभिन्न तत्व माने जाते है।
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